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विज्ञान और प्रौद्योगिकी की विभिन्न धाराओं में अन्वेषण , नित नए आविष्कार होते जा रहे है । प्रत्येक देश वैज्ञानिक अविष्कारों में स्वयं की प्राथमिकता दिखाने में स्पर्धा में लगे हुए है । ऐसे समय में कई लोग यह कहने वाले मिल जाते है प्राचीन भारत में तो वैज्ञानिकता थी ही नहीं , हम केवल परम्पराओं , आदर्शों , मूल्यों की बाते करते रहे
पर आईये कुछ ऐसे तथ्यों पर दृष्टि डालते है जो की आपकी तथाकथित पूर्व धारणा बदल देगी

भौतिकी –
प्रकाश के वेग की गणना आधुनिक भौतिकी की अद्भुत अविष्कारों में से एक है जिस की त्रुटी रहित गणना १८ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में की गयी । परन्तु इस वेग की गणना भारत के मनीषियों ने प्राचीन काल में ही कर ली थी

ऋग्वेद के प्रथम मंडल के ५ ० वें सूक्त के चौथे श्लोक पर भाष्य करते हुए महर्षि शायण ने निम्न श्लोक प्रस्तुत किया

तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥
-सायण ऋग्वेद भाष्य १. ५ ० .४

अर्थात आधे निमेष में २ २ ० २ योजन का मार्ग तय करने वाले सूर्य तुम्हे नमस्कार है
इस श्लोक के अनुसार यदि हम निमेष को समय की आधुनिक मात्रक सेकंड में एवं योजन को मीटर में परिवर्तित कर वेग की गणना करे तो वेग का मान उतना ही आता है जितना की आधुनिक यंत्रों से मापन करने पर ।
यह एक संयोग नहीं कहा जा सकता

18 निमीष = 1 काष्ठ;
30 काष्ठ = 1 कला;
30 कला = 1 मुहूर्त;
30 मुहूर्त = 1 दिन व् रात (लगभग 24 घंटे )

24 घंटे = 30*30*30*18= 486000 निमेष
24 घंटे में सेकंड हुए = 24*60*60 = 86400 सेकंड
1 निमिष = 86400 /486000 = .17778 सेकंड
1/2 निमिष =.08889 सेकंड

2202 योजन = 8 * 2202 = 17616 मील

अतः वेग = दूरी / समय
= 17616/0.8889
= 186000 मील प्रति सेकंड

खगोल विज्ञान –
जब पश्चिम में गैलिलियो के इतना कहने पर की सूर्य स्थिर है और पृथ्वी परिक्रमा करती है उसे मृत्यु दण्ड दे दिया गया उससे बहुत समय पहले भारतीय मनीषियों को पता था इस तथ्य का
जिसे समय समय पर कई विद्वानों ने इसका उल्लेख किया जैसे की आर्यभटट
ज्योतिष शास्त्र अपने आप में स्वयं अंतरिक्ष एवं खगोल विज्ञान का प्रमाण है ।

धातुकर्म प्रौद्योगिकी एवं धातु विज्ञान –
मेहरौली के लौह स्तम्भ के निर्माण में प्रयोग किये गए उच्च धातु विज्ञान द्वारा परिष्कृत
लौह धातु के बारे में सभी जानते है परन्तु इसके अतिरिक्त एक स्तम्भ कोल्लूर में है जहाँ ७५० सेमी वर्षा ६-८ महीने होती है परन्तु फिर भी इसमें जंग नहीं लगा ।
जस्ता धातु के अयस्क से जस्ता प्राप्त करने में अत्यंत कठिनाई होने के कारण बी( ज़स्ता के गलनांक एवं क्वथनांक में मात्र ३ डिग्री सेल्सियस कला अंतर होने के कारण ) इसका शोधन एक रहस्य बना रहा संसार के सामने ।
सर्वप्रथम विलीअम चैंपियन ने ब्रिटेन में ज़स्ते की रिफायनरी स्थापित की १५४३ में परन्तु इससे चार हजार वर्ष पहले ही भारत में इसका समाधान निकाला जा चुका था । यह कहा जा सकता है की चार हजार वर्षों तक पूरा संसार ज़स्ते के लिया भारत पे आश्रित था ।

रसायन विज्ञान –
महर्षि आगस्त्य ने बहुत समय पूर्व ही ज़स्ते और ताम्बे का उपयोग कर के लेक्लान्शे सेल के निर्माण की विधि एवं विद्युत् अप्घतनी रासायनिक क्रियायों का उल्लेख किया है ।

वैमानिक विज्ञान –
महर्षि भरद्वाज ने अपनी पुस्तक यन्त्र सर्वस्व में विभिन्न इंधनों से चलने वाली विमानों की संरचना का वर्णन किया है ।

चिकित्सा विज्ञान –
शल्य चिकित्सा का सफल प्रयोग शुश्रुत ने जिस समय भारत में किया उस समय सम्पूर्ण संसार चिकित्सा विज्ञान के प्रारंभिक तथ्यों से भी अनभिज्ञ थी ।
चरक भी प्राचीन भारत के महान चिकित्साविद थे । अनेक प्राचीन पुस्तकों में शल्य क्रिया में प्रयोग किये जाने यंत्रों का वर्णन है जो की आज भी आधुनिक युग में प्रयोग किये जाते है ।
पतंजलि के छोटे छोटे सूत्रों में आज भी चिकित्सा विज्ञान के अनेक रहस्य छिपे है ।

गणित –
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की बात हो एवं गणित की बात ना की जाये तो सर्वथा अन्याय होगा । दशमिक मान , शुन्य का आविष्कार जिसके बिना तो वैज्ञानिक गणनाओं का अस्तित्व ही नहीं भारत की ही देन है । गणना की गति तीव्र करने के लिए आज सभी वैदिक गणित की ओर देख रहे है । सर्वप्रथम त्रिकोंमितीय अनुपातों ज्य़ा (sine), कोज्या (cosine), इत्यादि को भारत में ही संज्ञा दी गयी । आव्यूह की संक्रियाओं का भी सूत्रों के रूप में वर्णन है । आधुनिक भौतिकी की तो कलन गणित के बिना संकल्पना ही नही की जा सकती जिसका वर्णन भी मिलता है । बौधायन प्रमेय , श्रीधराचार्य सूत्र इत्यादि इत्यादि ऐसे अनेकों योगदान है गणित के क्षेत्र में ।

ऐसे ही अनेक तथ्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से सम्बद्ध प्राचीन भारत के गर्भ में छिपे है , सबका वर्णन करना यहाँ संभव नहीं है चाहे वो संस्कृत भाषा की दक्षता की बात हो कंप्यूटर के एल्गोरिदम के लिए , कृत्रिम अंगों , गुरुत्वाकर्षण ,श्याम विविर (ब्लैक होल ),ध्वन्यात्मक लिपि (फोनेटिक स्क्रिप्ट ), पृथ्वी की आयु, ऐसे अनेकों तथ्य समय समय पर प्रकट होते रहे है ।
सुचना प्रौद्योगिकी के इस संस्थान का अंग एवं इस महान राष्ट्र के वासी होने के कारण हमारा दायित्व है की हम उन तथ्यों पर शोध कर संसार के सामने प्रकट कर अपने दायित्व का निर्वाह करे एवं वेदों की सर्वे भवन्तु सुखिनः की संकल्पना से संसार को कृतार्थ कर वसुधैव कुटुम्बकं को चरितार्थ करें ।

दर्द

जब दिल में कसक लगने लगे 

आँखों में दर्द झलकने लगे 
तो अपने तस्सवुर की फिजाओं में 
अपनी अनकही  रजाओं  में
एक रजा  यह भी करना 
मेरी अंतिम सांस भी ,
रजा में आपके जायेंगी 
हदे दोस्ती की भी ,
इम्तिहाँ हो जाएगी 
पर विश्वास है शायद 
 यह  तस्सवुर रंग लाएगी 

अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

रिमझिम रिमझिम बरसे बादर

पर सावन मन नहीं भाये

अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

 

 

जोहत ही नित बाट में

अब केहू केहू से पूछे

लागी बागन में अब

तो पिहू पिहू कोयलिया कूके

संगीत गूँज उठिल चहुँ दिशा

पर कैसे ये मन गाये

अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

 

अब  काटन को नित  दौड़त है

ये कुमकुम और ये बिंदिया

पाँवों में अंकुश लागत है

ये पायल और ये बिछिया

दिन तो कुरस होते बा

रजनी ने खोयी निंदिया

इस कोरी सी  तन्हाई  में

अब  कैसे निंदिया आये

 

अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

 

बह बह के आंसूअन  की धारा

अब  ये  नदिया  सुखी जाए

विरह अनल की जो उठती

वो तन मन नित  जलाये

बह गए वो  सारे  काजर कारे
अँखियाँ ये सूजी जाए

अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

 

रंग अबकी फीके है 

 रंग है उमंग है 

मृदंग में तरंग है 

परिवेश में हुडदंग है 

पर किसी ने आज मेरे 

भाव फिर खींचे है 

रंग अबकी फीके है 

 

चल पड़ा था सोच के 

एक ही कदम सही 

पर आज तो बढूँगा मैं 

हजार हो विपत्तियाँ 

पर उनसे तो लडूँगा मैं 

पर चला जिसके लिए था 

पाँव उसी ने खिचे है 

रंग अबकी फीके है 

 

 

हो रही थी पल्लवित 

मन में एक सुमन सी थी 

 सोच के आगे की 

बस उठ रही लगन सी थी 

पर खिलने से पहले ही 

तोड़ दिए फूल वो 

जो मैंने सींचे है 

रंग अबकी फीके है 

 

चाँदनी  रात

चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
बैठ के अकेले
मैं तुझको ही पुकारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
चाँदनी किरणे वो बिखर
रही है तन पे जो
मानो सिहर सिहर के वो
कर रही स्पर्श वो
समझ उन्हें स्पर्श तेरा
आज मैं दुलारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
देख के चकोर को
मैं हँस रहा हूँ बार बार
देख ले सजन को मेरे
हो जायेगा तार तार
भूल जायेगा उसे
जिसे देखता है बार बार
हजार बार कह के यही
मैं शेखियाँ बघारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
सीढियां लग जाती फिर
चाँद से तेरे लिए
और उतर के आती
मानो केवल मेरे लिए
पास में बिठा तुझे
फिर केश मैं सँवारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
फिर देखती है तू
मुझे प्रेम भरी आँखों से
छूटते है मन के पंक्षी
जैसे की साँलाखों से
बिन गिराए पलके
फिर तुझको ही निहारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ

वो दिल से क्यों नहीं जाती है
हर पल आँखों में आती है

पलकें घनी वो तेरी
बादल सा छा जाती है
और बिन मौसम के मुझपे
वर्षा ऋतु आ जाती है
तू क्यों आँखों में आती है

मासूमियत वो तेरी
मुझको कही ले जाती है
फिर बातें सोच अपनों की
वो आँख मेरी भर आती है
तू क्यों आँखों में आती है

वो चमक तेरे चेहरे की
मुझको नित भरमाती है
जो बंद करूँ अपनी आँखें
वो अन्दर भी आ जाती है
तू क्यों आँखों में आती है

सब कुछ तूने है छीन लिए
फिर भी तू ना जाती है
अब केवल है मेरे प्राण बचे
उसको भी लिए जाती है
तू क्यों आँखों में आती है

अश्रु भी नहीं आते है
वो मन को तो सहलाते है
और अपने जो कहलाते है
उन अपनों की महफ़िल में भी
यह तन्हाई कैसे छाई है
यह पीर कहाँ से आई है

ले जाता जो यह प्राण मेरे
तो बिखरे ना अरमान मेरे
जो खुशियों के परिमाण मेरे
उन खुशियों के के उजालों पर
यह छाई क्यों परछाई है
यह पीर कहाँ से आई है

यह पीर बढ़ा ही जाता है
अब दर्द सहा नहीं जाता है
अब दिल बाहर को आता है
अरे उनसे जिनसे आस जगी
वे भी लगते दिखाई है
यह पीर कहाँ से आई है

सब कुछ तूने था छीन लिया
सपनो पे भी ना रहम किया
ना जाने कितने दर्द दिया
अब अंतिम इस बेला पे भी
यह धुन तूने क्यों गायी है
यह पीर कहाँ से आई है

मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

अधरों पे हँसी का भार लिए
किसी कान्हे का आसार लिए
इन मुस्कराती आँखों को
अब अश्रु की फुहार चाहिए
मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

इस अभिनय की भी सीमा है
वो दर्द नहीं अब धीमा है
इस रंगमंच के पात्र को अब
विश्रान्ति का आधार चाहिए
मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

चमक रहा जो चेहरा है
पीछे एक काला पहरा है
इस काले से पहरे को अब
ये चमकीला आहार चाहिए
मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

सागर के गर्भ से अवशोषित
हो गयी है अब जल से पूरित
उन् श्यामल श्यामल मेघों को
वर्षा का अधिकार चाहिए
वर्षा का अधिकार
मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

यह कसक जो दिल में मेरे है
अब प्राण मेरे ले जाएगा
सिने से निकले है दिल
अब पीर सहा ना जायेगा

कैसे में रखूँ , कैसे मैं सहूँ
अब कुछ भी समझ में आये ना
यह बात अब लगी ऐसी है
की अब मुझको कुछ भी भाये ना

अश्रु की धारा अविरल हो
तो मन को मिलता चैन मेरे
पर सुखी है नदिया मेरी
और व्याकुल से है रैन मेरे

एक बार जो तू आ जाता
मुझसे इतना कह जाता
फिर जाने की परवाह नहीं
ये दर्द भी मैं सह जाता
स्पर्श तेरे उन हाथों का
रस भरी उन बातों का
वियोग सहा नहीं जाता
स्वप्न तेरी उन रातों का
अब पीर सहा नहीं जाता
अब पीर सहा नहीं जाता

हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

आता नहीं है मुझको
यूँ बनना और संवरना
बनके फिर तेरे समाज में
यूँ चलना और फिरना
पर मैंने तेरे जैसे
सभ्यता से चलते फिरते
रोज बनते और सँवरते
के चालों को भी देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

मैं नहीं जानता ये भी
कैसे करते है बातें
मुझको तो बस केवल
मूक वचन ही भाते
पर मैंने सभ्य सी वाणी में
विष का झरना भी देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

आती है मुझको जो
अपनी संस्कृति की बातें
वो प्रथमा के हो दिन
या पूर्णिमा की राते
नहीं मुझको है गिला खुद पे
अब सीखूंगा मैं औ हद पे
पर प्रेम की खोज में तुझको
अपनी गलियों में करते देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

हूँ रहने वाला मिट्टी का
पर वसुधा है परिवार मेरा
छोटा सा औ नन्हा ही सही
पर प्रेम का है संसार मेरा
पर मैंने अट्टालिकाओं
में रहने वालों के
कूपमंडूकता को देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है