Archive for मार्च, 2013


रंग अबकी फीके है 

 रंग है उमंग है 

मृदंग में तरंग है 

परिवेश में हुडदंग है 

पर किसी ने आज मेरे 

भाव फिर खींचे है 

रंग अबकी फीके है 

 

चल पड़ा था सोच के 

एक ही कदम सही 

पर आज तो बढूँगा मैं 

हजार हो विपत्तियाँ 

पर उनसे तो लडूँगा मैं 

पर चला जिसके लिए था 

पाँव उसी ने खिचे है 

रंग अबकी फीके है 

 

 

हो रही थी पल्लवित 

मन में एक सुमन सी थी 

 सोच के आगे की 

बस उठ रही लगन सी थी 

पर खिलने से पहले ही 

तोड़ दिए फूल वो 

जो मैंने सींचे है 

रंग अबकी फीके है 

 

चाँदनी  रात

चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
बैठ के अकेले
मैं तुझको ही पुकारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
चाँदनी किरणे वो बिखर
रही है तन पे जो
मानो सिहर सिहर के वो
कर रही स्पर्श वो
समझ उन्हें स्पर्श तेरा
आज मैं दुलारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
देख के चकोर को
मैं हँस रहा हूँ बार बार
देख ले सजन को मेरे
हो जायेगा तार तार
भूल जायेगा उसे
जिसे देखता है बार बार
हजार बार कह के यही
मैं शेखियाँ बघारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
सीढियां लग जाती फिर
चाँद से तेरे लिए
और उतर के आती
मानो केवल मेरे लिए
पास में बिठा तुझे
फिर केश मैं सँवारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
फिर देखती है तू
मुझे प्रेम भरी आँखों से
छूटते है मन के पंक्षी
जैसे की साँलाखों से
बिन गिराए पलके
फिर तुझको ही निहारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ

वो दिल से क्यों नहीं जाती है
हर पल आँखों में आती है

पलकें घनी वो तेरी
बादल सा छा जाती है
और बिन मौसम के मुझपे
वर्षा ऋतु आ जाती है
तू क्यों आँखों में आती है

मासूमियत वो तेरी
मुझको कही ले जाती है
फिर बातें सोच अपनों की
वो आँख मेरी भर आती है
तू क्यों आँखों में आती है

वो चमक तेरे चेहरे की
मुझको नित भरमाती है
जो बंद करूँ अपनी आँखें
वो अन्दर भी आ जाती है
तू क्यों आँखों में आती है

सब कुछ तूने है छीन लिए
फिर भी तू ना जाती है
अब केवल है मेरे प्राण बचे
उसको भी लिए जाती है
तू क्यों आँखों में आती है

अश्रु भी नहीं आते है
वो मन को तो सहलाते है
और अपने जो कहलाते है
उन अपनों की महफ़िल में भी
यह तन्हाई कैसे छाई है
यह पीर कहाँ से आई है

ले जाता जो यह प्राण मेरे
तो बिखरे ना अरमान मेरे
जो खुशियों के परिमाण मेरे
उन खुशियों के के उजालों पर
यह छाई क्यों परछाई है
यह पीर कहाँ से आई है

यह पीर बढ़ा ही जाता है
अब दर्द सहा नहीं जाता है
अब दिल बाहर को आता है
अरे उनसे जिनसे आस जगी
वे भी लगते दिखाई है
यह पीर कहाँ से आई है

सब कुछ तूने था छीन लिया
सपनो पे भी ना रहम किया
ना जाने कितने दर्द दिया
अब अंतिम इस बेला पे भी
यह धुन तूने क्यों गायी है
यह पीर कहाँ से आई है

मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

अधरों पे हँसी का भार लिए
किसी कान्हे का आसार लिए
इन मुस्कराती आँखों को
अब अश्रु की फुहार चाहिए
मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

इस अभिनय की भी सीमा है
वो दर्द नहीं अब धीमा है
इस रंगमंच के पात्र को अब
विश्रान्ति का आधार चाहिए
मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

चमक रहा जो चेहरा है
पीछे एक काला पहरा है
इस काले से पहरे को अब
ये चमकीला आहार चाहिए
मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

सागर के गर्भ से अवशोषित
हो गयी है अब जल से पूरित
उन् श्यामल श्यामल मेघों को
वर्षा का अधिकार चाहिए
वर्षा का अधिकार
मुझे रुदन का अधिकार चाहिए
रुदन का अधिकार

यह कसक जो दिल में मेरे है
अब प्राण मेरे ले जाएगा
सिने से निकले है दिल
अब पीर सहा ना जायेगा

कैसे में रखूँ , कैसे मैं सहूँ
अब कुछ भी समझ में आये ना
यह बात अब लगी ऐसी है
की अब मुझको कुछ भी भाये ना

अश्रु की धारा अविरल हो
तो मन को मिलता चैन मेरे
पर सुखी है नदिया मेरी
और व्याकुल से है रैन मेरे

एक बार जो तू आ जाता
मुझसे इतना कह जाता
फिर जाने की परवाह नहीं
ये दर्द भी मैं सह जाता
स्पर्श तेरे उन हाथों का
रस भरी उन बातों का
वियोग सहा नहीं जाता
स्वप्न तेरी उन रातों का
अब पीर सहा नहीं जाता
अब पीर सहा नहीं जाता

हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

आता नहीं है मुझको
यूँ बनना और संवरना
बनके फिर तेरे समाज में
यूँ चलना और फिरना
पर मैंने तेरे जैसे
सभ्यता से चलते फिरते
रोज बनते और सँवरते
के चालों को भी देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

मैं नहीं जानता ये भी
कैसे करते है बातें
मुझको तो बस केवल
मूक वचन ही भाते
पर मैंने सभ्य सी वाणी में
विष का झरना भी देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

आती है मुझको जो
अपनी संस्कृति की बातें
वो प्रथमा के हो दिन
या पूर्णिमा की राते
नहीं मुझको है गिला खुद पे
अब सीखूंगा मैं औ हद पे
पर प्रेम की खोज में तुझको
अपनी गलियों में करते देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

हूँ रहने वाला मिट्टी का
पर वसुधा है परिवार मेरा
छोटा सा औ नन्हा ही सही
पर प्रेम का है संसार मेरा
पर मैंने अट्टालिकाओं
में रहने वालों के
कूपमंडूकता को देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

जब याद तेरी आ जाती है

एक तन्हाई सा छू जाती है

भीड़ में भी वो मुझको

फिर तन्हा सा कर जाती है

चंचल से जो नैना तेरे

श्यामल से वो केश घनेरे

जादू सा कर जाते है

मुझको वो ले जाते है

दूर कही नदिया के पास 

बिछी हुई है कोमल घास 

मदहोशी है आस पास

लगता है सब ख़ास ख़ास 

फिर डूबते हुए सूरज के

पीछे से तुम आती हो

और मदभरे नयनों से 

तीखे बाण चलाती हो 

हो जाता है दिल तार तार 

मन करता है फिर बार बार 

भर लूं तुझको इन बाहों में

कोरी अपनी निगाहों में

वही कही उन राहों में

फिर गोद तेरी मिल जाती

एक जादू सा कर जाती

और यूँ ही लेटे  लेटे

ये जिंदगी कट जाती

जो गोद तेरी मिल जाती