यह कसक जो दिल में मेरे है
अब प्राण मेरे ले जाएगा
सिने से निकले है दिल
अब पीर सहा ना जायेगा

कैसे में रखूँ , कैसे मैं सहूँ
अब कुछ भी समझ में आये ना
यह बात अब लगी ऐसी है
की अब मुझको कुछ भी भाये ना

अश्रु की धारा अविरल हो
तो मन को मिलता चैन मेरे
पर सुखी है नदिया मेरी
और व्याकुल से है रैन मेरे

एक बार जो तू आ जाता
मुझसे इतना कह जाता
फिर जाने की परवाह नहीं
ये दर्द भी मैं सह जाता
स्पर्श तेरे उन हाथों का
रस भरी उन बातों का
वियोग सहा नहीं जाता
स्वप्न तेरी उन रातों का
अब पीर सहा नहीं जाता
अब पीर सहा नहीं जाता

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