हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

आता नहीं है मुझको
यूँ बनना और संवरना
बनके फिर तेरे समाज में
यूँ चलना और फिरना
पर मैंने तेरे जैसे
सभ्यता से चलते फिरते
रोज बनते और सँवरते
के चालों को भी देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

मैं नहीं जानता ये भी
कैसे करते है बातें
मुझको तो बस केवल
मूक वचन ही भाते
पर मैंने सभ्य सी वाणी में
विष का झरना भी देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

आती है मुझको जो
अपनी संस्कृति की बातें
वो प्रथमा के हो दिन
या पूर्णिमा की राते
नहीं मुझको है गिला खुद पे
अब सीखूंगा मैं औ हद पे
पर प्रेम की खोज में तुझको
अपनी गलियों में करते देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

हूँ रहने वाला मिट्टी का
पर वसुधा है परिवार मेरा
छोटा सा औ नन्हा ही सही
पर प्रेम का है संसार मेरा
पर मैंने अट्टालिकाओं
में रहने वालों के
कूपमंडूकता को देखा है
हाँ मैं वही हूँ
जो तुमने सोचा है

Advertisements