अश्रु भी नहीं आते है
वो मन को तो सहलाते है
और अपने जो कहलाते है
उन अपनों की महफ़िल में भी
यह तन्हाई कैसे छाई है
यह पीर कहाँ से आई है

ले जाता जो यह प्राण मेरे
तो बिखरे ना अरमान मेरे
जो खुशियों के परिमाण मेरे
उन खुशियों के के उजालों पर
यह छाई क्यों परछाई है
यह पीर कहाँ से आई है

यह पीर बढ़ा ही जाता है
अब दर्द सहा नहीं जाता है
अब दिल बाहर को आता है
अरे उनसे जिनसे आस जगी
वे भी लगते दिखाई है
यह पीर कहाँ से आई है

सब कुछ तूने था छीन लिया
सपनो पे भी ना रहम किया
ना जाने कितने दर्द दिया
अब अंतिम इस बेला पे भी
यह धुन तूने क्यों गायी है
यह पीर कहाँ से आई है

Advertisements