वो दिल से क्यों नहीं जाती है
हर पल आँखों में आती है

पलकें घनी वो तेरी
बादल सा छा जाती है
और बिन मौसम के मुझपे
वर्षा ऋतु आ जाती है
तू क्यों आँखों में आती है

मासूमियत वो तेरी
मुझको कही ले जाती है
फिर बातें सोच अपनों की
वो आँख मेरी भर आती है
तू क्यों आँखों में आती है

वो चमक तेरे चेहरे की
मुझको नित भरमाती है
जो बंद करूँ अपनी आँखें
वो अन्दर भी आ जाती है
तू क्यों आँखों में आती है

सब कुछ तूने है छीन लिए
फिर भी तू ना जाती है
अब केवल है मेरे प्राण बचे
उसको भी लिए जाती है
तू क्यों आँखों में आती है

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