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जब याद तेरी आ जाती है

एक तन्हाई सा छू जाती है

भीड़ में भी वो मुझको

फिर तन्हा सा कर जाती है

चंचल से जो नैना तेरे

श्यामल से वो केश घनेरे

जादू सा कर जाते है

मुझको वो ले जाते है

दूर कही नदिया के पास 

बिछी हुई है कोमल घास 

मदहोशी है आस पास

लगता है सब ख़ास ख़ास 

फिर डूबते हुए सूरज के

पीछे से तुम आती हो

और मदभरे नयनों से 

तीखे बाण चलाती हो 

हो जाता है दिल तार तार 

मन करता है फिर बार बार 

भर लूं तुझको इन बाहों में

कोरी अपनी निगाहों में

वही कही उन राहों में

फिर गोद तेरी मिल जाती

एक जादू सा कर जाती

और यूँ ही लेटे  लेटे

ये जिंदगी कट जाती

जो गोद तेरी मिल जाती

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पंखुड़ियाँ

कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है -2
जला के आँसू वो अपने
घुट घुट के रोती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है
कभी जो मिल के रहती थी
तो हरदम मुस्कुराती थी
बिछड़ के आज जो आवाज
उनके दिल में होती है
सिसकियाँ बस वे भरती है
कुछ ना कह वे पाती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है
खिल के आगे बढ़ने की
तमन्ना ने मिलाया था
एक ही बगिया में मिलके
खिलने को सिखाया था
आज सबकुछ पाकर भी
ना जाने क्यों वे रोती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है
मिलने और खिलने से
शुरू होता सबेरा था
ये बगिया ही तो उनके
खुसबू का सबेरा था
अब कैसा होगा हर सबेरा
सोचती है औ रोती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है
इसी बगिया ने गोदी
में उनको जो खिलाया था
अपने स्तन से प्रेम का
क्षीर पिलाया था
पंखुड़ियाँ तो रोती है आज
बगिया हर बार रोती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है

शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है
जीवन जो सरपट दीखता है
फिर ये कैसी गहरी खाई है
शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है
चमचम सी जो चमक रही है
मानो की जैसे बहक रही है
पर उस बेहोशी के पीछे
पर उस बेहोशी के पीछे
एक कुहा सी छायी है
शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है
लगे हुए है क्रम से जो
और रंग बिरंगे सारे है
कई शीतल तो कई उष्म से है
कई श्वेत से है कई कारे है
पर एक चित्र के पीछे
पर एक चित्र के पीछे
गहरी काली स्याही है
शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है
हो रही है टिप टिप टिप सी
रिसती है धरती सिप सिप सी
शीतलता तो जग दिखाई है
शीतलता तो जग दिखाई है
उस पर तो घटा घिर आई है
शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है

अब तो मुझे तू जीने दे
पथ जो थे मेरे अपने
नयनों के थे वे सपने
जो देखे थे सब हमने
हो गए धूमिल वो  कबके
पर किरकिरी आँखों में
उन पीछे पड़े सलाखों में
खो गए है जो लाखों में
कैसे मिट जायेंगे
कैसे रूक जायेंगे
जो चलते थे नित साथ मेरे
बाँहों में डाले हाथ मेरे
थे आखिर वे दिन रात मेरे …
पर तुझसे ना देखि गयी
मेरी वो खिलती कलियाँ
राहों में मिलती गलियां
भावों की मेरी नदिया
हाय खारे सागर में मिला दिया
नहीं चाहिए तेरी भीख मुझे
जीवन जीने की सिख मुझे
बस एक घूँट अब मुझको
अपने मन की पीने दे
अब तो मुझे तू जीने दे

माँ

माँ

माँ

जब जब बादल घिर आता है
मौसम कुरस हो जाता है
जब नींद भी आँखों में माँ
आने से कतराता है
वो धुन लोरी की तेरी
मुझको ले जाता है ………….
जाने कही अज्ञात पे
निर्मल से प्रपात पे
फिर झरने की डोरी पे
मुझको वो सुलाता है
जब जब बदल घिर आता है

जब बात किसी की लग जाती है
माँ घाव ह्रदय पे आती है
चलते चलते या फिर
चोट कही लग जाती है
वो मरहम हांथों की तेरी ………..
दग्ध से उन घावों पे
विष बुझे उन बाणों पे
माँ चन्दन सा बिछ जाती है
जब बात किसी की लग जाती है

जब भूख मुझे माँ लगता है
खाने का दिल नहीं करता है
सब होते हुए भी जब माँ
दिल मेरा नहीं भरता है
वो इक ही कोर माँ तेरी …………
अतृप्त मेरे उस प्यास को
माँ मेरे उन जज्बात को
पल भर में पूरण करता है
जब भूख मुझे माँ लगता है

जब याद कहीं से आते है
मुझको वो तड़पाते है
धीरे धीरे से जब माँ
दो बिंदु छलक के आते है
वो स्पर्श हाथों की तेरी ……….
बिखरे से उन केशों पे
भीगे मेरे नेत्रों पे
एक जादू सा कर जाते है
जब याद कहीं से आते है

अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी

एक नयन मिलने को आतुर
कब से बेतरतीब अड़े है
दूजे में तो बस केवल अब
टूटे से  अरमान पड़े है
एक और मिलने की आशा
दूजी ओर विकट  कुहासा
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अविरल धारा एक तरफ है
पर उसे रोकने वाला है
बह चली जहाँ आसव की धार
वहाँ  कौन सँभालने  वाला है
एक ओर बिखरे है शूल
दूजी तरफ विवशता की भूल
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
एक ओर  मन सिहर चुका  है
मंतव्य समझाने को
एक ओर पग ठिठक  चुका   है
गंतव्य को जाने को
एक ओर  सजदे का सहारा
दूजे का नहीं कोई किनारा
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
एक बेचारा बँधा पड़ा है
खुद के ही जंजीरों  से
दूजा  अब उलझ चूका है
कोरी अपनी तकदीरों से
एक मन मिलने को तरसता
दूजे को भूलने की विवशता
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी

kaise hans doon?

लोग कहते है की मैं हँस दूँ ?
पर स्मृतियों की रेखाएँ
विहग सी पंख फैलाये
जब करती है मन पे विचरन
तो फिर क्यों ना हो सिमरन
उस अतीत का ,
उस गीत का
जो कभी गाया था मैंने
उत्साह से जो कभी
गुनगुनाया था मैंने
पर वक्त ने सब कुछ बदला
गति बदली दिशा बदली
बदले ध्येय और पहलू बदला
पर गीत के रस में जाने
उसने विष क्यों घोला ?
वे ही तो थे प्राण मेरे
नित नव खिलते अरमान मेरे
खुशियों के परिमाण मेरे
और अब लोग कहते है
जीवन को कसौटी पे कस दूँ
मैं यूँ ही कैसे हँस दूँ ?

– स्मरण –

क्यों होते तुम हो पथ विमुख

कर्तव्यों से लिया मोड़ मुख

भर के हुंकार कर के ललकार

जो कूद पड़ता था दावानल में

क्यों आज बैठा है मौन वो

क्या आ गया तेरे मन में

जीवन यह जो समझा तेरा है

यह तो औरों का संबल है

स्मृति में वो क्षण तो ला

जिसमे नवजीवन प्रतिपल है

जिसने बैठना सिखा नहीं

उसने किया भूमि शयन

कौन सी वो चिंगारी है बनी

जिसे देख किये तुने बंद नयन

शत बार पर्वत पर चढ़ने को

जिसने था दृढ संकल्प लिया

लक्ष्य तो तेरा दूर है अभी

फिर क्यों पग अपना खीच लिया

तट पर पड़े बेमुल्य सीपों को

क्या तुमने मोती मान लिया

क्या मरीचिका के भ्रम में

तुने जल है उसे मान लिया

प्यास बुझेगी तब तेरी जब

मरू को उद्यान बना देगा

गहरे समुद्र में जाकर के

जलधि रत्नों को ला देगा

जागेगा तू चिरनिद्रा से जब

यह भू भी फिर काँप उठेगी

असंख्य आशा दीपों से

तेरा अंतर श्रृंगार करेगी

जो दिप्तियाँ है बिखर गयी

उनका जरा ध्यान करों

दिप्तियों से बना अग्नि इस

मृत जीवन का संहार करो

संकल्प करो फिर से अब तुम

अब तो सुखद नींद वही होगी

जिसमे स्वप्नों का जंजाल न ही

न ही कोई हलचल होगी |