चाँदनी  रात

चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
बैठ के अकेले
मैं तुझको ही पुकारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
चाँदनी किरणे वो बिखर
रही है तन पे जो
मानो सिहर सिहर के वो
कर रही स्पर्श वो
समझ उन्हें स्पर्श तेरा
आज मैं दुलारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
देख के चकोर को
मैं हँस रहा हूँ बार बार
देख ले सजन को मेरे
हो जायेगा तार तार
भूल जायेगा उसे
जिसे देखता है बार बार
हजार बार कह के यही
मैं शेखियाँ बघारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
सीढियां लग जाती फिर
चाँद से तेरे लिए
और उतर के आती
मानो केवल मेरे लिए
पास में बिठा तुझे
फिर केश मैं सँवारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
फिर देखती है तू
मुझे प्रेम भरी आँखों से
छूटते है मन के पंक्षी
जैसे की साँलाखों से
बिन गिराए पलके
फिर तुझको ही निहारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ