रंग अबकी फीके है 

 रंग है उमंग है 

मृदंग में तरंग है 

परिवेश में हुडदंग है 

पर किसी ने आज मेरे 

भाव फिर खींचे है 

रंग अबकी फीके है 

 

चल पड़ा था सोच के 

एक ही कदम सही 

पर आज तो बढूँगा मैं 

हजार हो विपत्तियाँ 

पर उनसे तो लडूँगा मैं 

पर चला जिसके लिए था 

पाँव उसी ने खिचे है 

रंग अबकी फीके है 

 

 

हो रही थी पल्लवित 

मन में एक सुमन सी थी 

 सोच के आगे की 

बस उठ रही लगन सी थी 

पर खिलने से पहले ही 

तोड़ दिए फूल वो 

जो मैंने सींचे है 

रंग अबकी फीके है