अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

रिमझिम रिमझिम बरसे बादर

पर सावन मन नहीं भाये

अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

 

 

जोहत ही नित बाट में

अब केहू केहू से पूछे

लागी बागन में अब

तो पिहू पिहू कोयलिया कूके

संगीत गूँज उठिल चहुँ दिशा

पर कैसे ये मन गाये

अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

 

अब  काटन को नित  दौड़त है

ये कुमकुम और ये बिंदिया

पाँवों में अंकुश लागत है

ये पायल और ये बिछिया

दिन तो कुरस होते बा

रजनी ने खोयी निंदिया

इस कोरी सी  तन्हाई  में

अब  कैसे निंदिया आये

 

अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

 

बह बह के आंसूअन  की धारा

अब  ये  नदिया  सुखी जाए

विरह अनल की जो उठती

वो तन मन नित  जलाये

बह गए वो  सारे  काजर कारे
अँखियाँ ये सूजी जाए

अब काहे करूँ श्रृंगार

जब पिया नहीं आये

 

अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी

एक नयन मिलने को आतुर
कब से बेतरतीब अड़े है
दूजे में तो बस केवल अब
टूटे से  अरमान पड़े है
एक और मिलने की आशा
दूजी ओर विकट  कुहासा
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अविरल धारा एक तरफ है
पर उसे रोकने वाला है
बह चली जहाँ आसव की धार
वहाँ  कौन सँभालने  वाला है
एक ओर बिखरे है शूल
दूजी तरफ विवशता की भूल
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
एक ओर  मन सिहर चुका  है
मंतव्य समझाने को
एक ओर पग ठिठक  चुका   है
गंतव्य को जाने को
एक ओर  सजदे का सहारा
दूजे का नहीं कोई किनारा
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
एक बेचारा बँधा पड़ा है
खुद के ही जंजीरों  से
दूजा  अब उलझ चूका है
कोरी अपनी तकदीरों से
एक मन मिलने को तरसता
दूजे को भूलने की विवशता
अब कहिये किसकी पीर बड़ी
अब कहिये किसकी पीर बड़ी

– स्मरण –

क्यों होते तुम हो पथ विमुख

कर्तव्यों से लिया मोड़ मुख

भर के हुंकार कर के ललकार

जो कूद पड़ता था दावानल में

क्यों आज बैठा है मौन वो

क्या आ गया तेरे मन में

जीवन यह जो समझा तेरा है

यह तो औरों का संबल है

स्मृति में वो क्षण तो ला

जिसमे नवजीवन प्रतिपल है

जिसने बैठना सिखा नहीं

उसने किया भूमि शयन

कौन सी वो चिंगारी है बनी

जिसे देख किये तुने बंद नयन

शत बार पर्वत पर चढ़ने को

जिसने था दृढ संकल्प लिया

लक्ष्य तो तेरा दूर है अभी

फिर क्यों पग अपना खीच लिया

तट पर पड़े बेमुल्य सीपों को

क्या तुमने मोती मान लिया

क्या मरीचिका के भ्रम में

तुने जल है उसे मान लिया

प्यास बुझेगी तब तेरी जब

मरू को उद्यान बना देगा

गहरे समुद्र में जाकर के

जलधि रत्नों को ला देगा

जागेगा तू चिरनिद्रा से जब

यह भू भी फिर काँप उठेगी

असंख्य आशा दीपों से

तेरा अंतर श्रृंगार करेगी

जो दिप्तियाँ है बिखर गयी

उनका जरा ध्यान करों

दिप्तियों से बना अग्नि इस

मृत जीवन का संहार करो

संकल्प करो फिर से अब तुम

अब तो सुखद नींद वही होगी

जिसमे स्वप्नों का जंजाल न ही

न ही कोई हलचल होगी |