चाँदनी  रात

चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
बैठ के अकेले
मैं तुझको ही पुकारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
चाँदनी किरणे वो बिखर
रही है तन पे जो
मानो सिहर सिहर के वो
कर रही स्पर्श वो
समझ उन्हें स्पर्श तेरा
आज मैं दुलारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
देख के चकोर को
मैं हँस रहा हूँ बार बार
देख ले सजन को मेरे
हो जायेगा तार तार
भूल जायेगा उसे
जिसे देखता है बार बार
हजार बार कह के यही
मैं शेखियाँ बघारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
सीढियां लग जाती फिर
चाँद से तेरे लिए
और उतर के आती
मानो केवल मेरे लिए
पास में बिठा तुझे
फिर केश मैं सँवारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ
फिर देखती है तू
मुझे प्रेम भरी आँखों से
छूटते है मन के पंक्षी
जैसे की साँलाखों से
बिन गिराए पलके
फिर तुझको ही निहारता हूँ
चाँदनी रात में
मैं चाँद में निहारता हूँ

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जब याद तेरी आ जाती है

एक तन्हाई सा छू जाती है

भीड़ में भी वो मुझको

फिर तन्हा सा कर जाती है

चंचल से जो नैना तेरे

श्यामल से वो केश घनेरे

जादू सा कर जाते है

मुझको वो ले जाते है

दूर कही नदिया के पास 

बिछी हुई है कोमल घास 

मदहोशी है आस पास

लगता है सब ख़ास ख़ास 

फिर डूबते हुए सूरज के

पीछे से तुम आती हो

और मदभरे नयनों से 

तीखे बाण चलाती हो 

हो जाता है दिल तार तार 

मन करता है फिर बार बार 

भर लूं तुझको इन बाहों में

कोरी अपनी निगाहों में

वही कही उन राहों में

फिर गोद तेरी मिल जाती

एक जादू सा कर जाती

और यूँ ही लेटे  लेटे

ये जिंदगी कट जाती

जो गोद तेरी मिल जाती

पंखुड़ियाँ

कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है -2
जला के आँसू वो अपने
घुट घुट के रोती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है
कभी जो मिल के रहती थी
तो हरदम मुस्कुराती थी
बिछड़ के आज जो आवाज
उनके दिल में होती है
सिसकियाँ बस वे भरती है
कुछ ना कह वे पाती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है
खिल के आगे बढ़ने की
तमन्ना ने मिलाया था
एक ही बगिया में मिलके
खिलने को सिखाया था
आज सबकुछ पाकर भी
ना जाने क्यों वे रोती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है
मिलने और खिलने से
शुरू होता सबेरा था
ये बगिया ही तो उनके
खुसबू का सबेरा था
अब कैसा होगा हर सबेरा
सोचती है औ रोती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है
इसी बगिया ने गोदी
में उनको जो खिलाया था
अपने स्तन से प्रेम का
क्षीर पिलाया था
पंखुड़ियाँ तो रोती है आज
बगिया हर बार रोती है
कभी हँसती थी जो पंखुड़ियाँ
वो आज रोती है

शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है
जीवन जो सरपट दीखता है
फिर ये कैसी गहरी खाई है
शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है
चमचम सी जो चमक रही है
मानो की जैसे बहक रही है
पर उस बेहोशी के पीछे
पर उस बेहोशी के पीछे
एक कुहा सी छायी है
शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है
लगे हुए है क्रम से जो
और रंग बिरंगे सारे है
कई शीतल तो कई उष्म से है
कई श्वेत से है कई कारे है
पर एक चित्र के पीछे
पर एक चित्र के पीछे
गहरी काली स्याही है
शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है
हो रही है टिप टिप टिप सी
रिसती है धरती सिप सिप सी
शीतलता तो जग दिखाई है
शीतलता तो जग दिखाई है
उस पर तो घटा घिर आई है
शोर भरे है चेहरें पर
पर एक उदासी छायी है

अब तो मुझे तू जीने दे
पथ जो थे मेरे अपने
नयनों के थे वे सपने
जो देखे थे सब हमने
हो गए धूमिल वो  कबके
पर किरकिरी आँखों में
उन पीछे पड़े सलाखों में
खो गए है जो लाखों में
कैसे मिट जायेंगे
कैसे रूक जायेंगे
जो चलते थे नित साथ मेरे
बाँहों में डाले हाथ मेरे
थे आखिर वे दिन रात मेरे …
पर तुझसे ना देखि गयी
मेरी वो खिलती कलियाँ
राहों में मिलती गलियां
भावों की मेरी नदिया
हाय खारे सागर में मिला दिया
नहीं चाहिए तेरी भीख मुझे
जीवन जीने की सिख मुझे
बस एक घूँट अब मुझको
अपने मन की पीने दे
अब तो मुझे तू जीने दे

माँ

माँ

माँ

जब जब बादल घिर आता है
मौसम कुरस हो जाता है
जब नींद भी आँखों में माँ
आने से कतराता है
वो धुन लोरी की तेरी
मुझको ले जाता है ………….
जाने कही अज्ञात पे
निर्मल से प्रपात पे
फिर झरने की डोरी पे
मुझको वो सुलाता है
जब जब बदल घिर आता है

जब बात किसी की लग जाती है
माँ घाव ह्रदय पे आती है
चलते चलते या फिर
चोट कही लग जाती है
वो मरहम हांथों की तेरी ………..
दग्ध से उन घावों पे
विष बुझे उन बाणों पे
माँ चन्दन सा बिछ जाती है
जब बात किसी की लग जाती है

जब भूख मुझे माँ लगता है
खाने का दिल नहीं करता है
सब होते हुए भी जब माँ
दिल मेरा नहीं भरता है
वो इक ही कोर माँ तेरी …………
अतृप्त मेरे उस प्यास को
माँ मेरे उन जज्बात को
पल भर में पूरण करता है
जब भूख मुझे माँ लगता है

जब याद कहीं से आते है
मुझको वो तड़पाते है
धीरे धीरे से जब माँ
दो बिंदु छलक के आते है
वो स्पर्श हाथों की तेरी ……….
बिखरे से उन केशों पे
भीगे मेरे नेत्रों पे
एक जादू सा कर जाते है
जब याद कहीं से आते है

kaise hans doon?

लोग कहते है की मैं हँस दूँ ?
पर स्मृतियों की रेखाएँ
विहग सी पंख फैलाये
जब करती है मन पे विचरन
तो फिर क्यों ना हो सिमरन
उस अतीत का ,
उस गीत का
जो कभी गाया था मैंने
उत्साह से जो कभी
गुनगुनाया था मैंने
पर वक्त ने सब कुछ बदला
गति बदली दिशा बदली
बदले ध्येय और पहलू बदला
पर गीत के रस में जाने
उसने विष क्यों घोला ?
वे ही तो थे प्राण मेरे
नित नव खिलते अरमान मेरे
खुशियों के परिमाण मेरे
और अब लोग कहते है
जीवन को कसौटी पे कस दूँ
मैं यूँ ही कैसे हँस दूँ ?